गुरू के शरीर का अपना एक आकर्षण होता है
श्री गुरु उवाच.... "गुरू के शरीर का अपना एक आकर्षण होता है और उसका सान्निध्य जितना मिले, उतना कम ही लगता है । इसलिए जब भी जीवन में गुरु का सान्निध्य मिले, अात्मसात् करना चाहिए, उनकी स्मृतियों को भीतर ही सँजोकर रखना चाहिए क्योंकि वे स्मृतियाँ जीवन में एक बड़ी धरोहर होती हैं । गुरू से भी बड़ा गुरू का कार्य होता है । मुझे जीवन में गुरूसान्निध्य केवल कुछ घण्टे ही मिला है लेकिन उन स्मृतियों को मैंने मनमंदिर में स्थापित कर लिया है और अब गुरूकार्य कर रहा हूँ "। "जब गुरूकार्य करता हूँ तो लगता है कि मैं मेरे गुरु के सान्निध्य में ही हूँ । क्योंकि गुरूकार्य में सूक्ष्म रूप से गुरु छिपे हुए होते ही हैं । और गुरूकार्य करते समय वह समय--समय पर मार्गदर्शन करते रहते हैं और गुरूकार्य होता रहता है ।"
-HSY -- 4 Pg-65.
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