प्रत्येक सुबह मनुष्य का चित्त भी एक छोटे बच्चे की तरह होता है।
प्रत्येक सुबह मनुष्य का चित्त भी एक छोटे बच्चे की तरह होता है। आप सुबह-सुबह चित को जो भी आकार दो वैसा ही वह दिनभर बना रहता है। सुबह उठने के बाद के हमारे दो धण्टे बड़े महत्त्वपूर्ण होते हैं।
अगर हमें सुबह के समय दो धण्टे अपने चित्त को भीतर रखना आ गया तो फिर स्थिर रहना (चित का) और शुद्ध रहना स्वयं ही हो जाएगा ।
-भाग - ५
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