आत्मा का जीवन हजारों सालों का होता है।
क्योंकि आत्मा उस शरीर में वापस कभी नहीं आती है। एक बार किसी शरीर को आत्मा ने छोड़ा तो छोड़ा। बाद में लौटकर उस शरीर में वापस आने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। शरीर क्षणभंगुर है, शरीर नाशवान है , अस्थाई है। उसे कभी भी दूसरा जन्म नहीं लेना पड़ता। इसका जीवन बहुत छोटा है जबकि आत्मा को तो बार-बार अलग-अलग शरीर धारण करना पडते हैं और आत्मा को बार-बार जन्म लेना पड़ता है। आत्मा का जीवन हजारों सालों का होता है। इसीलिए उसके लिए शरीर तो कोई मायना नहीं रखता है। इतने सारे शरीर धारण किए उसमें से एक शरीर , बस इतना संबंध। अब मनुष्य का ही देखो। मनुष्य अपने जीवन में कितने जगह, कितने कमरों में सोया उसे याद है क्या ? नहीं। पता नहीं। इतने बड़े जीवन में कितने स्थानों पर गया, कितने कमरों में उसने अपनी रातें गुजरी , उसे कुछ भी याद नहीं रहता। यह भी ठीक वैसा ही है। या मनुष्य जिस प्रकार से बचपन से लेकर बुठापे तक कितने वस्त्र पहनता है, उसे याद रहता है क्या ? नहीं। यह ठीक वैसा ही है। आत्मा के लिए शरीर एक वस्त्र के समान ही है।
भाग - ६ ९९
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