भीतर की यात्रा

       हम दुनियाभर की खोज करते है ,पर अपने -आपको कभी नही खोजते है । जो खोज करना आवश्यक है ,वह छोड़कर बाहर सब खोजते रहते है । औऱ जैसे ही यह प्रश्न जानने का प्रयास करते है ,तो हमारी भीतर की यात्रा प्रारंभ हो जाती है । औऱ जब भीतर की यात्रा प्रारंभ हो जाती है ,तो हम जान जाते है -"शरीर औऱ 'मै' अलग -अलग है । "औऱ 'मै 'शरीर से अलग हो जाता है औऱ एक आध्यात्मिक क्रांति घटित होती है ।

ही.का.स.योग - 1 / 72
परमपूज्य स्वामीजी

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