मनुष्य की स्वयं की इच्छा,उसका माध्यमरूपी सद्गुरु के प्रति पूर्ण समर्पणऔर सदगुरु का संकल्प,

मनुष्य की स्वयं की इच्छा,उसका माध्यमरूपी सद्गुरु के प्रति पूर्ण समर्पणऔर सदगुरु का संकल्प,ये तीनों बातें एकत्र हो जाएँ तो मनुष्य को आत्मसाक्षात्कार (आत्मजागृति) मिल सकती है। और यह होने पर कुण्डलिनी शक्त्ति जो शरीर के भीतर सोई हुई थी,वह जागती है और ऊपर की ओर उठती है और सभी चक्रों को ऊर्जा प्रदान करके अंत में सहस्रार चक्र,जो तालु भाग पर होता है,वहाँ पहुँचती है और कुछ समय के लिए स्थिर हो जाती है। और ऐसा होने पर मनुष्य के भूतकाल के सभी विचार बंद हो जाते हैं,भविष्यकाल के सभी विचार बंद हो जाते हैं और एक निर्विचारिता की स्थिति प्रत्येक मनुष्य को प्राप्त होती है। और थोड़ा समय इसी स्थिति में रहने पर जो ऊर्जा वह भूतकाल के विचार करके नष्ट कर रहा था और जो ऊर्जा भविष्यकाल के विचार करके नष्ट कर रहा था,वह बच जाती है।और उसे बाद में प्रसन्नता लगती है।और ध्यान की इसी पद्दति से प्रतिदिन ध्यान करता है तो ४५ दिनों के बाद वह अपने-आपमें एक अच्छा परिवर्तन महसूस करता है। उसेआध्यातमिक,शारीरिक,मानसिक,आर्थिक,सामाजिक,सभी क्षेत्रों में प्रगति होती हुई अनुभव होती है। क्योंकि वह अपनी शक्त्तियों को एकत्र कर सही दिशा में प्रवाहित करना सीख जाता है। और ऐसा किसी भी धर्म का मनुष्य कर सकता है।और समूचे शरीर में स्पंदन अनुभव होते हैं। सारे शरीर से ही ठण्डी लहरियाँ बह रही हैं,यह अनुभव होता है। मनुष्य अपने भीतर एक शांति का अनिभव करता है जो शांति उसने अपने जीवन में कभी नहीं पाई होती है।...

हि.स.यो-४                
पु-४३९

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