ऊँ श्री शिवकृपानंद स्वामी नमो नमः
यह मंत्र केवल कुछ शब्दों का समूह नहीं है। इस मंत्र के साथ हिमालय के ऋषि-मुनियों की तपस्या और साधना से प्राप्त हुई शक्त्तियाँ और उनके आशीर्वाद जुड़ें हुए हैं। उन्होंने अपने अधिकृत माध्यम के द्वारा ही संपर्क किया है। इस मंत्र की ऊर्जाशक्त्ति का अनुभव किसी भी जाति,किसी भी धर्म,किसी भी देश , किसी भी लिंग के मनुष्यों को एक -समान होगा। और यह इसलिए होगा कि हिमालय के ऋषि -मुनियों की इच्छा थी की यह ईश्वरीय अनुभूति संसार के उस प्रत्येक मनुष्य तक पहुँचे जो ईश्वर को पाना चाहता है।ईश्वर को किसी धर्मविशेष से बाँधा (के दायरे में सीमित रखा) नहीं जा सकता है। वह तो निराकार है,वह तो मानने पर निर्भर करता है।परमात्मा का कोई रूप नहीं है और जो रूप माने गए हैं,वे सभी माध्यम हैं। आप किसी भी माध्यम को मानकर ईश्वरप्राप्ति कर सकते हैं,यही संदेश इस मंत्र के माध्यम से दिया गया है।प्रत्येक मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति हो,इसी उद्देश से , इसी संकल्प के साथ इस मंत्र को आशीर्वाद किया गया है। यह किसी देवता का नाम नहीं है,यह केवल एक सामान्य मनुष्य के माध्यम से बह रही शक्त्तियों को नमस्कार है। उस सामान्य मनुष्य को ही ऋषि-मुनियों ने माध्यम बनाया है ताकि दुनिया का कोई भी ,सामान्य-से-सामान्य मनुष्य भी उस माध्यम तक पहुँच सके।क्योंकि हिमालय के ऋषि-मुनि हिमालय के इतने अंदर हैं कि वे सामान्य मनुष्य तक नहीं पहुँच सकते हैं और सामान्य मनुष्य उन तक कभी भी नहीं पहुँच सकता है। इसलिए,सामान्य मनुष्य तक पहुँचने के लिए उन्होंने समाज के ही एक सामान्य मनुष्य को अपना माध्यम बनाया है। इस मंत्र बनाने का मुख्य उद्देश उनका सामान्य मनुष्य तक पहुँचना है।...
हि.स.यो-४
पु-४३८
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