समर्पण ध्यान पध्दति की सबसे बड़ी विशेषता
समर्पण ध्यान पध्दति की सबसे बड़ी विशेषता
' अनुभूति ' का होना हैऔर वह किसी को भी हो सकती है जो उसे ग्रहण करना चाहे। और यह अनुभूति मनुष्य को निः शुल्क प्राप्त होगी।यह ईश्वरीय प्रसाद है,इसलिए माध्यम इसे निःशुल्क प्रदान करेगा।इसके लिए वह कुछ भी नहीं लेता है। और बाद में इसी प्रकार से प्रतिदिन ध्यान करके वह मनुष्य अपने-आपको पवित्र करने का अभ्यास कर सकता है।ध्यान अगर सामूहिकता में करेगा तो आत्मशक्त्तियों की वृध्दि के साथ-साथ उनका नियंत्रण भी हो सकेगा।
आत्मशक्त्तियों को,अनुभूति के सतत अभ्यास के द्वारा वृद्दीगत किया जा सकता है।और अगर सामूहिकता में यह प्रयास किया जाए तो शक्तियाँ वृद्दीगत भी होंगी और नियंत्रित भी होंगी।यह पध्दति ऋषि-मुनियों ने सामूहिकता के दृष्टिकोण से ही बनाई है और उसी से संकल्प भी किया है।और इसीलिए इस ध्यान को सामुहिकता में करना आवश्यक है। समाज में,जहाँ पर सामूहिकता के साथ वैचारिक प्रदूषण भी है,वैचारिक प्रदूषण वाले,तो ऐसे वातावरण में मन को एकाग्र करने का प्रयास अकेले में
सफल नहीं होगा।
यह ध्यान पध्दति अपनाने के लिए उसे अपने जीवन में कुछ भी छोड़ना नहीं है। वह जो भी खाता है,खाता रहे व जो भी पीता है,पीता रहे।जैसे भी जीवन जीता है,जीता रहे। कोई भी नियम या प्रतिबंध नहीं है। इसलिए किसी भी प्रकार का मनुष्य इसे अपना सकता है, किसी भी स्तर का मनुष्य इसे अपना सकता है। इसमें उम्र का भी कोई बंधन नहीं है,किसी भी उम्र में इसे सीखा जा सकता है।...
हि.स.यो-४
पु-४४०
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