शून्य शिखर पर अनहत बाजे

निर्विचारिता की स्थिति यानी घ्यान नहीं है। घ्यान में जाने में सहायक स्थिति निर्विचारिता की स्थिति है। कई बार समाज में लोग निर्विचारिता की स्थिति को ही घ्यान की स्थिति  समज लेते हैं। घ्यान की स्थिति निर्विचारिता के उपर की स्थिति होती है। और जब तालु भाग में स्पंदन का अनुभव होने लगता है तो एक आत्मानंद हमें प्राप्त होता है। ईसी स्थिति का वर्णन संत कबीर ने अपने शब्दों में किया है
शून्य शिखर पर अनहत बाजे
यानी जब आप शून्य शिखर यानी इस सहस्त्रार चक्र पर पहुंच जाते हैं तो आपको अनहत का नाद वह स्पंदन का नाद सुनाई देने लगता है। यह तो वही अनुभव कर सकता है जो इस चक्र तक पहुंचा हो। इस चक्र पर बिना अघिकारी गुरु के पहुंचा जा नहीं सकता है। यह स्थिति निर्विचारिता की स्थिति के भी ऊपर की स्थिति होती है।

हि  स योग भाग ६ पानु २६१

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