आध्यात्मिक क्रांति

" जब भी कभी आध्यात्मिक क्रांति इस जगत में आएगी, तो उस आध्यात्मिक क्रांति का क्रियान्वयन ' स्त्री-शक्त्ति 'से ही होगा। स्त्रीसुलभ गुण है - वह अपने जीवन में एक साथ कई रिश्तों से, कई नातों से जुड़ी हुई होती है। वह शरीर से एक होकर भी अनेक रूपों में समर्थता के साथ जीती है। जब वह एक ओर गर्भ में अपने शिशु की माँ होती हैं, उसी समय वह अपने पति की पत्नी भी होती है। जबकि पुरुष अपनी पत्नी का पति होता है, पर बाप नहीं होता। वह अपने शिशु से अलिप्त रहता है। जब तक स्त्रीशक्त्ति को समान दर्जा नहीं दिया जायेगा , तब तक समाज में कोई आध्यात्मिक क्रांति सम्भव नहीं है। क्योंकि तब तक समाज पंगु होगा। पंगु समाज कभी दौड़ नहीं सकता हैं ।"
   
हि. का. स. यो.
पेज 51 , 024

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