शरीर
मेरा शरीर पहले से ही कमजोर था लेकिन इस कमजोर शरीर ने भी मेरा काफी सहारा दिया। मेरे शरीर ने कमजोर होते हुए भी मुझे मोक्ष की स्थिति तक पहुँचाया। मैं तो मेरे शरीर का भी आभारी हूँ। अब पता नहीं क्यों ,आत्मा शरीर छोड़कर बार-बार बाहर निकल जाती है। यानी अब शरीर छोड़ने का ही समय आ गया है।मैं तो कब का छोड़ देता लेकिन तेरे कारण ही रुका हुआ था।अब तुझे तेरी भी चिंता नहीं है। अब मैं थक गया हूँ और इस शरीर को अधिक कष्ट देना अच्छा नहीं लगता।"और बाद में उन्होंने देहत्याग कर दिया।"
हम सभी उनकी बातें सुनते-सुनते कब पहाड़ी से नीचे उतर गए,हमें पता भी नहीं चला।फिर हम सभी लकड़ियाँ इकट्ठा करने लग गए थे। कई वृक्ष ऊँचे हो जाने पर वे जोर की आँधी से ही उखड़ जाते थे।और जंगल इतना घना था कि वह वृक्ष उखड़ जाने के बाद भी जमीन पर नहीं गिर पाता था,वह पास के ही वृक्ष पर गिरकर पड़ा रहता था क्योंकि नीचे गिरने के लिए खाली जमीन ही नहीं थी। कुछ फल भी जमा किए थे।मैं ही पहली बार आया था पर उनको,कौनसे फल का वृक्ष कहाँ हैं,यह सब पता था। वे बोले--नीचे उतरने में अधिक समय नहीं लगता है,नीचे तो जल्दी आ जाते हैं। पर जब लकड़ियाँ इकट्ठा कर ऊपर छढ़ते हैं,तब लकड़ियों के वजन के कारण अधिक समय लगता है। कुछ विशिष्ट प्रकार के वृक्षों की ही लकड़ियाँ वे खोज रहे थे जो औषधीवाली थीं।उनके जलाने से वातावरण शुध्द होता था,सभी को प्रसन्न लगता था और उन लकड़ियों का धुँआ आरोग्य के लिए भी अच्छा था।
इसलिए वे विशिष्ट प्रकार की लकड़ियाँ ही एकत्र कर रहे थे। उन्हें उनकी जानकारी थी। मैं तोड़ी हुई लकड़ियाँ इकट्ठा करके उन्हें बाँस के छिलकों और कुछ बेलों से बाँधकर उनके गद्वे बना रहा था। वहाँ पर उस दिन मुझे कुछ नए फलों की और नई वनस्पतियों की जानकारी मिल रही थी। कुछ वृक्षों के छिलके भी औषधियुक्त थे,वे भी हमने जमा किए।...
हि.स.यो-४
पु-३८२
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