टीलेनुमा पहाड़ी

वहाँ पर एक और टेकड़ी (टीलेनुमा पहाड़ी) थी।  टेकड़ी के उस पार क्या होगा इस कुतूहलवश मैं अकेला ही उस पर पहुँचा तो वहाँ का दृश्य देखता ही रह गया।  वहाँ  पर एक तालाब था और उस तालाब में हजारों पक्षी तैर रहे थे।उसमें अधिकतर राजहंस थे।अन्य पक्षी कुछ और अलग आकार-प्रकार के थे।मुझे ऐसा लगा कि वे साइबेरिया से आए हुए पक्षी होंगे।मैंने बाद में चारों मुनियों को भी बुलाया और वहाँ पर वह दृश्य   देखकर वे भी दंग रह गए।वे बोले,
" यह टेकड़ी हमने देखी है लेकिन इस पर चढ़कर दूसरी ओर दखने का विचार हमें कभी नहीं आया।"  हमने उस पहाड़ी पर ही रात के समय रुकने का मन बनाया। वहाँ कुछ बड़े-बड़े पत्थर थे,उन्हीं की ओट (आड़) में हम भी एकत्र हो गए।सामने का दृश्य बहुत ही सुंदर था।वे पक्षी प्रजनन करने के लिए वहाँ आए हुए थे।वह स्थान खूब ऊँचाई पर होने के कारण किसी शत्रु का उन्हें भय   नहीं था।और यह उनका अनुभव रहा होगा कि वहाँ पर कोई उनका शिकार नहीं करता था।इसीलिए उन्होंने प्रजनन के लिए वह स्थान चुना था। पक्षी प्रजनन के लिए दूर जाते हैं क्योंकि उन्हें सदैव  सुरक्षित स्थान की आवश्यकता होती है। वहाँ पर उनके छोटे-छोटे बच्चे भी दिख रहे थे। वहाँ पर कुछ वनस्पतियाँ थीं जो वे अपने बच्चों को चोंच से लेकर खिला रहे थे। हमारे आने का पता उन्हें चल गया था लेकिन बाद में उन्होंने हमारी उपस्थिति  को स्वीकार  कर लिया था।उन्हें हमसे कोई भी खतरा नहीं लगा था,हम हमारे बातें करते हुए बैठे थे। शाम के समय थोड़े फल आदि का भोजन  करने के बाद  बातों का दौर ऐसे ही चल पड़ा था।...

हि.स.यो-४                 
पु-३८३

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