सारी मनुष्यजाति को ही दो भागों में बाँटना चाहिए।

सारी मनुष्यजाति को ही दो भागों में बाँटना चाहिए। *एक अज्ञानी और एक ज्ञानी* बस।  भले ही वे किसी भी देश के हों , किसी भी जाति, भाषा के हों। वे इन्ही दो भागों में आ जाते है।

जो अज्ञानी हैं, उन पर शरीर का प्रभाव अधिक होता हैं और वे शरीर की समस्या, शरीर की आवश्यकता, शरीर की सुविधा का ही सोचते हैं। क्योंकि अज्ञानता के कारण ही सोचते हैं, जो दिख रहा है, वह शरीर ही सब कुछ है।

*जब की यह अज्ञानी यह नहीं जानते कि शरीर तो इस जन्म में ही खत्म हो जाएगा। शरीर को दुसरा जन्म नहीं लेना पड़ता लेकिन आत्मा को दुसरा जन्म लेना पड़ता है। तो शरीर से सबसे बड़ी समस्या आत्मा की ही है।*

आत्मा का जीवनकाल बड़ा है, शरीर का नहीं। शरीर तो क्षणभंगुर होता है। शरीर का तो एक ही जीवन है। आत्मा को कई जीवन लेना पड़ते है। शरीर का जीवन तो आत्मा के जीवन का छोटा-सा हिस्सा मात्र है। *लेकिन अज्ञानता के कारण मनुष्य की दृष्टि संकुचित हो जाती है। और वह अपने शरीर के अलावा और कुछ नहीं देखता है।*

और *ज्ञानी मनुष्य जानता है- यह जीवन नाशवान है। इसके बाद मुझे दुसरा जन्म ना लेना पड़े इसके लिए कुछ करना चाहिए। यह शरीर की समस्या तो इस शरीर के साथ ही समाप्त हो जाएगी। जब शरीर ही नाशवान है तो शरीर की समस्या कैसे शाश्वत हो सकती है।*

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*हिमालय का समर्पण योग* ६/९२

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