देव पहाड़

मुझे अचानक आज याद आया कि ये पहाड़ तो जब मैं गाँव के पास से गुजर रहा था तब दिख ही था। इसे गाँववाले ' देव पहाड़ ' कहते थे,इस पर देव रहते हैं ऐसी उनकी धारणी थी।देव, गंधर्व वहाँ पर निवास करते हैं ऐसी उनकी मान्यता थी। इसी कारण इस पहाड़ को वे आदरयुक्त भाव से देखते थे,इस पहाड़ को नमस्कार भी करते थे पर इस पर चढ़ने की कभी भी नहीं सोचते थे। वे कहते थे ,वहाँ देवलोक है,देव अपनी आराधना में लीन हैं,हमें उनकी साधना में विघ्न नहीं डालनी है। इस पहाड़ पर विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ पाई जाती थीं। डाक्टर बाबा को उसका काफी ज्ञान था और उन्हें उसमें रुचि भी थी।वे अलग-अलग पेड़-पौधे लगाते भी  रहते थे।तब तक मेरी सभी मुनियों के साथ  अच्छी मित्रता हो गई थी और सभी को मालूम हो गया था कि मैं  वहाँ रहनेवाला नहीं था,मैं वहाँ से जाने ही वाला था। इसलिए वे सब मुझे अधिक महत्व देते थे।वहाँ पर कोई मन्दिर या मूर्ति नहीं थी लेकिन कुछ मुनियों के पास  छोटी -छोटी ,पंचधातु की बनी हुई मूर्तियाँ थीं,वे व्यक्तिगत रूप से उनकी पूजा करते थे।सारे पर्वत पर ही एक अलग सा वातावरण था,एक अलग प्रकार की सुगंध उस वातावरण में थी।वह किस फूल की या किस इत्र की है,वह कहा नहीं जा सकता क्योंकि वह सुगंध जीवन में कभी ली ही नहीं थी।बड़ी मन की शांति देने वाली सुगंध थी और वह सुगंध वहा पूरे समय होती थी,मानो वहाँ की हवा में ही बसी हो। उस सुगंध पर ध्यान दो तो पता चलता था कि जब मैं साँस लेता था तो साँस फेफड़ों में कहाँ तक पहुँच रही है,किस फेफड़ों मेंऔर शरीर में वह प्रसन्नता भर देती थी। पूरे शरीर में ही एक प्रकार का उत्साह का संचार होता रहता था।यानी उस सुगंध को मैं घण्टों लेते रहता था और कितनी भी लेता तो भी अच्छा ही लगता था। वह सुगंध ही अत्यंत दिव्य थी,कभी-कभी उस सुगंध में केशर की सुगंध भी महसूस होती थी। उस सुगंध का यहाँ के तापमान पर भी प्रभाव था।.....

हि.स.यो-४                  
पु-३०३

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