महल
ध्यान करते - करते साधक का मन पवित्र हो जाता है । वह जानता है की जँमोँ के सत्त्कर्म के कारण ही उसे सदगुरु मिला है । उसकी शुद्ध इच्छा है की दुनिया से अज्ञानता रूपी अंधेरा दूर हो । तथा मन में जो दुखों के बसेरे है , बस्तियाँ है वहाँ खुशियों के मेले हो । इसलिए वह प्रार्थना करता है की हे गुरूवर हम सभी को मन की शांति दीजिए क्योंकि शांति के नींव पर ही परम आनंदरूपी महल का निर्माण किया जा सकता है ।
॥ गुरुमाँ ॥
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