आत्मसमाधान मिलने पर ही मनुष्य सुखी हो सकता है

आत्मसमाधान  मिलने पर  ही मनुष्य सुखी हो सकता है और वहअगर नहीं मिला तो सब सुख बेकार हैं।वास्तव में, जिस प्रकार से भगवान तो कोई शरीर हैं ही नहीं,सब भगवान के माध्यम हैं और भगवान तो आप किसी भी माध्यम  को मान सकते हैं। ठीक वैसे ही,' सुख ' ऐसा कुछ भी नहीं है। जिसे सुख समझते हैं, वह क्षणिक है। सब मानने के ऊपर है।उसे मानो तो सुख है,न मानों तो नहीं है। सच्चा सुख तो आत्मसुख है यानी जब आपकी आत्मा प्रसन्न हो जाती है। बस फिर आपके जीवन में और कोई सुख पाने की लालस नहीं रहती है। एक पूर्ण समाधान,एक पूर्ण शांति का अनुभव होता है।ऐसी ही अनुभूति हिमालय की गुफा में श्री शिवबाबा ने मुझे कराई थी जो अनुभूति प्राप्त होने के बाद  जीवन में पूर्ण समाधान प्राप्त हो गया है।अब जीवन में पाने के लिए कुछ रह ही नहीं गया है। अब तो देना ही जीवन हो गया है क्योंकि उनके आशीर्वाद से जो अनुभूति हुई,उसने तो मेरे भीतर की सारी संरचना ही बदल दी थी। सारी संवेदनाओं का प्रवाह अंदर से बाहर की ओर होने लगा था।सारे विचार भी,दूसरों को कैसे फायदा हो,दूसरों  को कैसे सुख  मिले इसके  ही होते थे। मैं तो तब से प्रत्येक क्षण दूसरों  के लिए ही  जी रहा हूँ, ऐसा प्रतीत  हो रहा था।प्रत्येक साँस जो लेता हूँ,वह कुछ देने के लिए  ही है,ऐसा लग रहा था। उस पवित्र पहाड़ी पर बैठे-बैठे ही मुझे समाधि लग गई   और उस पवित्र सुगंध को मैं मेरे अंदर तक  महसूस कर रहा था।....

हि.स.यो-४                    
पु-३०५

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