सद्गुरू एक माध्यम है
हृदय मानता है और परमेश्वर भी मानने की चीज है. आपको मानना होगा. जितने मानोगे, उतना ही ' मैं ' का अहंकार कम होगा.
' मैं ' को झुकने के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है.
ऐसा माध्यम, बस जहाँ परमपिता परमेश्वर याद आ जाए.
झुकना सदैव सामूहिकता में आसान होता है क्योंकि झुकने के लिए भाव चाहिए. मन चंचल है, अच्छा भाव आने ही नहीं देता है. अच्छा भाव तो सामूहिकता में ही आ सकता है.
हम अपने आपको जितना सामूहिकता के साथ जोड़ेंगे, उतना ही हमारा ' मैं ' का भाव कम होगा. और जितना ' मैं ' का भाव कम होगा, उतना ही अपने अस्तित्व का बोध कम होगा.
जीवन से समस्याएँ नहीं है, इस ' ' मैं ' के अस्तित्व के कारण निर्माण कर ली हैं. ' मैं ' और बाद में 'मेरी' समस्याएँ इसी मायाजाल में जीवन की शाम कब आ गई इसका पता भी नहीं चलता है.
' मैं ' को ' मैं ' नहीं गिरा सकता है. इसलिए सामूहिकता आवश्यक है.
' मैं ' का अस्तित्व एक ग्लास के पानी जैसा होता है. 'सद्गुरु' का अस्तित्व सागर जैसा होता है. क्योंकि सामूहिकता है.
-आध्यात्मिक सत्य
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