गुरु एक स्थान पर चित्त तखकर वह स्थान पर चित्त से भी अपने शिष्य को ले जा सकता है।

मैंने कहा , मुझे इसकी संभावना कम ही लगती है क्योंकि अनुभूति करते हुए  चित्र  बनाना तो असंभव लगता है और अनुभूति को याद करके बाद में चित्र बनाना भी संभव नहीं है।
हुआ यह होगा , किसी योगी ने ध्यान साधना करके अपने ही भीतर नदियों का और चक्रों का , चक्रों की पंखड़ियों का ,चक्रों के स्थान का , चक्र के स्पदन का , कुण्डलिनी के साथ का , रंग का , आकर का और उसकी उठती हुई स्थिती का अनुभव किया होगा और वही अपना अनुभव किसी अपने शिष्य को चित से दिखाया होगा। गुरु एक स्थान पर चित्त तखकर वह स्थान पर चित्त से भी अपने शिष्य को ले जा सकता है। मेरे एक गुरु ने हिमालय में बैठकर सांगली के गणेश मंदिर के दर्शन कराए थे।

भाग - ६ - १२७/ १२८

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