सहस्रार चक्र
" एक आत्मशांति का अनुभव हमें इस स्थान (सहस्त्रार) पर जाकर मिलता है। सारी भाग-दौड़ और सारी हड़बड़, सारी खोज ही समाप्त हो जाती है। जो दौड़ हमने जन्मो-जन्मो से की है, वह दौड़ समाप्त हो जाती है और उस शांति के तालाब में फिर सहस्त्र कमल खिलते हैं।
इस चक्र पर आकर आपको अनुभूति होती है कि हजारों कमल आपके इस स्थान पर एक साथ खिल गए हैं। वास्तव में, इस चक्र पर हजारों पंखुडियाँ होती हैं और वे खिल जाने के बाद इस प्रकार की अनुभूति होती है। यहाँ पहुँचकर साधक एक समाधान की स्थिति को अनुभव करता है।
और उसके बाद साधक के इस चक्र से एक अमृत रस निकलता है, वह रस धीरे-धीरे समूचे शरीर पर ही फैल जाता है और वह बहते-बहते हमारे सभी ऊर्जा केंद्रों को, सभी चक्रों को, सभी नाडियों को शक्ति और नई ऊर्जा प्रदान करता है और हमारे समूचे शरीर में ही हम एक प्रकार का नवचैतन्य अनुभव करते हैं।"
हि.स.योग.6-पेज. 266.
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