आज मेरे साथ है ही। तू ही देख ले कैसे तूफान आता है।
मैंने कहा , तू आज मेरे साथ है ही। तू ही देख ले कैसे तूफान आता है। वह चुप हो गया। लेकिन वह मेरी बात से सहमत नहीं था। लेकिन पत्नी और बच्चे पूर्ण आश्वस्त थे कि तूफान नहीं आएगा बोला है तो अब वह नहीं आएगा। बाद में जब हम वह राजमहल देख रहे थे , पत्नी बोली , तुम्हारे गुरुओं की ही इच्छा होगी कि यहाँ तूफान नहीं आए। इसीलिए यह तूफान आने के तीन महीने पहले से ही अपनी बराबर यही तारीख यहाँ आने के लिए निश्चित कर दी थी। तुम्हें यहाँ भेजना भी उनकी ही योजना का एक अंग है। विश्वचेतना भी कैसे बराबर सभी जगह संतुलन रखते रहती है। आज आप कोई अकेले थोड़े आए हैं ? आप के साथ आपके ग्यारह गुरु भी हैं , तो यह गुरुओं की सामूहिकता बराबर यहाँ संतुलन करेगी ही। वास्तव में तो गुरुशक्तियों को ही यहाँ आना था , वे तो हिमालय से बाहर निकल ही नहीं सकतीं तो उन्होंने माध्यम बनाया औऱ यहाँ पहुँच गई और आपके मुख से भी निकल गया कि दो तूफान कभी एक साथ नहीं आ सकते हैं। मैनें कहा, पता नहीं , कई बार ऐसा अनायास ही मुँह से निकल जाता है। मानो , जैसे कोई शक्ति अपने से बुलवा रही है और अपने मुँह पर अपना ही नियंत्रण नहीं है। अन्यथा , मैं कभी भी चलती गाड़ी में ड्रायवर से अधिक बात करना पंसद नहीं करता हूँ और ड्राइवर चिढ़ जाए , ऐसी बाते तो कभी करुँगा ही नहीं। लेकिन पता नहीं आज ऐसा क्यों मुँह से निकल गया।
भाग - ६ - १२५/१२६
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