"मैं "के कर्ताभाव से आप बाहर नही निकलते , समर्पण ध्यान में प्रगति असंभव है
जब तक "मैं "के कर्ताभाव से आप बाहर नही निकलते , समर्पण ध्यान में प्रगति असंभव है , आप आपका समय व्यर्थ गवाँ रहे है । एक म्यान में दो तलवारे नही रह सकती , वैसे ही "कर्ताभाव "और "समर्पण "दोनों एक साथ नही होता । क्योँकि संपूर्ण "समर्पण "कर दिया तो आपका कर्ताभाव कैसे रह सकता है । यह कर्ता भाव लेकर भी मेरे साथ रहते हो इसलिए मेरे साथ रहकर भी झगड़ते रहते हो । आपने जब कर्ता भाव ही समर्पीत कर दिया है तो आपका तो अपना कोई "अस्तित्व "ही नही बचा , आप तो मेरे "अंग -प्रत्यंग "बन गए । तो बताओ , मेरा एक हाथ दूसरे हाथ को मदत करता है या झगड़ता है , ऐसा कर्ता भाव रखकर समर्पण का नाटक करते हो । तो जैसा तेरा गाना , वैसा मेरा बजाना होता है ।
बाबा स्वामी
16/2/2012
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